महाभारत 5.142.22
धात्र्या विश्रब्धया गुप्ता सखीजनवृता तदादोषं परिहरन्ती च पितुश्चारित्ररक्षिणी
dhātryā viśrabdhayā guptā sakhījanavṛtā tadādoṣaṃ pariharantī ca pituścāritrarakṣiṇī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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