महाभारत 5.145.11
अप्रियं हृदये मह्यं तन्न तिष्ठति केशवतेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो
apriyaṃ hṛdaye mahyaṃ tanna tiṣṭhati keśavateṣāṃ vākyāni govinda śrotumicchāmyahaṃ vibho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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