महाभारत 5.149.40
इन्द्रस्यापि भयं ह्येते जनयेयुर्महाहवेकिं पुनर्धार्तराष्ट्राणां लुब्धानां पापचेतसाम्
indrasyāpi bhayaṃ hyete janayeyurmahāhavekiṃ punardhārtarāṣṭrāṇāṃ lubdhānāṃ pāpacetasām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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