महाभारत 5.149.47
एवमुक्ते तु कृष्णेन संप्रहृष्यन्नरोत्तमाःतेषां प्रहृष्टमनसां नादः समभवन्महान्
evamukte tu kṛṣṇena saṃprahṛṣyannarottamāḥteṣāṃ prahṛṣṭamanasāṃ nādaḥ samabhavanmahān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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