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महाभारत 5.151.4
विदुरस्यापि ते वाक्यं श्रुतं भीष्मस्य चोभयोःकुन्त्याश्च विपुलप्रज्ञ प्रज्ञा कार्त्स्न्येन ते श्रुता
vidurasyāpi te vākyaṃ śrutaṃ bhīṣmasya cobhayoḥkuntyāśca vipulaprajña prajñā kārtsnyena te śrutā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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