महाभारत 5.152.19रथस्यासन्दश गजा गजस्य दश वाजिनःनरा दश हयस्यासन्पादरक्षाः समन्ततःrathasyāsandaśa gajā gajasya daśa vājinaḥnarā daśa hayasyāsanpādarakṣāḥ samantataḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें