महाभारत 5.155.18
ततः स कवची खड्गी शरी धन्वी तली रथीध्वजेनादित्यवर्णेन प्रविवेश महाचमूम्
tataḥ sa kavacī khaḍgī śarī dhanvī talī rathīdhvajenādityavarṇena praviveśa mahācamūm
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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