महाभारत 5.155.2
आहृतीनामधिपतेर्भोजस्यातियशस्विनःदाक्षिणात्यपतेः पुत्रो दिक्षु रुक्मीति विश्रुतः
āhṛtīnāmadhipaterbhojasyātiyaśasvinaḥdākṣiṇātyapateḥ putro dikṣu rukmīti viśrutaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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