महाभारत 5.16.4
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हविःयजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरे
tvamevāgne havyavāhastvameva paramaṃ haviḥyajanti satraistvāmeva yajñaiśca paramādhvare
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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