महाभारत 5.160.7
भावस्ते विदितोऽस्माभिर्दुर्बुद्धे कुलपांसनन हनिष्यन्ति गाङ्गेयं पाण्डवा घृणयेति च
bhāvaste vidito'smābhirdurbuddhe kulapāṃsanana haniṣyanti gāṅgeyaṃ pāṇḍavā ghṛṇayeti ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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