महाभारत 5.162.30
सिन्धुराजो महाराज मतो मे द्विगुणो रथःयोत्स्यते समरे राजन्विक्रान्तो रथसत्तमः
sindhurājo mahārāja mato me dviguṇo rathaḥyotsyate samare rājanvikrānto rathasattamaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें