महाभारत 5.162.32
एतेन हि तदा राजंस्तप आस्थाय दारुणम्सुदुर्लभो वरो लब्धः पाण्डवान्योद्धुमाहवे
etena hi tadā rājaṃstapa āsthāya dāruṇamsudurlabho varo labdhaḥ pāṇḍavānyoddhumāhave
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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