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महाभारत 5.162.33
स एष रथशार्दूलस्तद्वैरं संस्मरन्रणेयोत्स्यते पाण्डवांस्तात प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान्
sa eṣa rathaśārdūlastadvairaṃ saṃsmaranraṇeyotsyate pāṇḍavāṃstāta prāṇāṃstyaktvā sudustyajān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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