महाभारत 5.17.17
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्शचीपतेजितेन्द्रियो जितामित्रः स्तूयमानो महर्षिभिः
triviṣṭapaṃ prapadyasva pāhi lokāñśacīpatejitendriyo jitāmitraḥ stūyamāno maharṣibhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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