महाभारत 5.170.7
मयाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीयानपि धर्मतःविचित्रवीर्यो धर्मात्मा मामेव समुदैक्षत
mayābhiṣikto rājendra yavīyānapi dharmataḥvicitravīryo dharmātmā māmeva samudaikṣata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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