महाभारत 5.174.3
केचिच्छाल्वपतिं गत्वा नियोज्यमिति मेनिरेनेति केचिद्व्यवस्यन्ति प्रत्याख्याता हि तेन सा
kecicchālvapatiṃ gatvā niyojyamiti menireneti kecidvyavasyanti pratyākhyātā hi tena sā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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