महाभारत 5.175.11
क्व संप्रति महाबाहो जामदग्न्यः प्रतापवान्अकृतव्रण शक्यो वै द्रष्टुं वेदविदां वरः
kva saṃprati mahābāho jāmadagnyaḥ pratāpavānakṛtavraṇa śakyo vai draṣṭuṃ vedavidāṃ varaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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