महाभारत 5.176.10
यदि त्वामापगेयो वै न नयेद्गजसाह्वयम्शाल्वस्त्वां शिरसा भीरु गृह्णीयाद्रामचोदितः
yadi tvāmāpageyo vai na nayedgajasāhvayamśālvastvāṃ śirasā bhīru gṛhṇīyādrāmacoditaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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