महाभारत 5.177.13
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव रणे यदिब्रह्मद्विड्भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव
brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdraścaiva raṇe yadibrahmadviḍbhavitā taṃ vai haniṣyāmīti bhārgava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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