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महाभारत 5.178.21
को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम्वासयेत गृहे जानन्स्त्रीणां दोषान्महात्ययान्
ko jātu parabhāvāṃ hi nārīṃ vyālīmiva sthitāmvāsayeta gṛhe jānanstrīṇāṃ doṣānmahātyayān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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