महाभारत 5.178.32
तत्र त्वं निहतो राम मया शरशताचितःलप्स्यसे निर्जिताँल्लोकाञ्शस्त्रपूतो महारणे
tatra tvaṃ nihato rāma mayā śaraśatācitaḥlapsyase nirjitām̐llokāñśastrapūto mahāraṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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