महाभारत 5.178.36
यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिषत्सु वैनिर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छृणु
yaccāpi katthase rāma bahuśaḥ pariṣatsu vainirjitāḥ kṣatriyā loke mayaikeneti tacchṛṇu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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