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महाभारत 5.178.3
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारितःऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः
gāṃ puraskṛtya rājendra brāhmaṇaiḥ parivāritaḥṛtvigbhirdevakalpaiśca tathaiva ca purohitaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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