महाभारत 5.180.28
नव चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम्प्राहिण्वं कङ्कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति
nava cāpi pṛṣatkānāṃ śatāni nataparvaṇāmprāhiṇvaṃ kaṅkapatrāṇāṃ jāmadagnyarathaṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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