महाभारत 5.180.7
मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमेदिव्याश्वयुजि संनद्धे काञ्चनेन विभूषिते
manasā vihite puṇye vistīrṇe nagaropamedivyāśvayuji saṃnaddhe kāñcanena vibhūṣite
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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