महाभारत 5.184.2
नक्तंचराणां भूतानां रजन्याश्च विशां पतेशयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम्
naktaṃcarāṇāṃ bhūtānāṃ rajanyāśca viśāṃ pateśayanaṃ prāpya rahite manasā samacintayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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