महाभारत 5.185.13
सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरेविह्वलश्चाभवद्राजन्वेपथुश्चैनमाविशत्
sā tasya dvijamukhyasya nipapāta bhujāntarevihvalaścābhavadrājanvepathuścainamāviśat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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