महाभारत 5.190.13
कृतदारः शिखण्डी तु काम्पिल्यं पुनरागमत्न च सा वेद तां कन्यां कंचित्कालं स्त्रियं किल
kṛtadāraḥ śikhaṇḍī tu kāmpilyaṃ punarāgamatna ca sā veda tāṃ kanyāṃ kaṃcitkālaṃ striyaṃ kila
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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