महाभारत 5.190.23
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मतेएष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव
tasyādya vipralambhasya phalaṃ prāpnuhi durmateeṣa tvāṃ sajanāmātyamuddharāmi sthiro bhava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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