महाभारत 5.192.7स्वभावगुप्तं नगरमापत्काले तु भारतगोपयामास राजेन्द्र सर्वतः समलंकृतम्svabhāvaguptaṃ nagaramāpatkāle tu bhāratagopayāmāsa rājendra sarvataḥ samalaṃkṛtamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें