महाभारत 5.194.4अप्रधृष्यमनावार्यमुद्वृत्तमिव सागरम्सेनासागरमक्षोभ्यमपि देवैर्महाहवेapradhṛṣyamanāvāryamudvṛttamiva sāgaramsenāsāgaramakṣobhyamapi devairmahāhaveइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें