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महाभारत 5.22.3
नाहं क्वचित्संजय पाण्डवानां; मिथ्यावृत्तिं कांचन जात्वपश्यम्सर्वां श्रियं ह्यात्मवीर्येण लब्ध्वा; पर्याकार्षुः पाण्डवा मह्यमेव
nāhaṃ kvacitsaṃjaya pāṇḍavānāṃ; mithyāvṛttiṃ kāṃcana jātvapaśyamsarvāṃ śriyaṃ hyātmavīryeṇa labdhvā; paryākārṣuḥ pāṇḍavā mahyameva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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