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महाभारत 5.33.17
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीस्तम्भो मान्यमानितायमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते
krodho harṣaśca darpaśca hrīstambho mānyamānitāyamarthānnāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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