महाभारत 5.33.47
एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपलभ्यतेयदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः
ekaḥ kṣamāvatāṃ doṣo dvitīyo nopalabhyateyadenaṃ kṣamayā yuktamaśaktaṃ manyate janaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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