महाभारत 5.34.21
कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान्क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान्
kāṃścidarthānnaraḥ prājño laghumūlānmahāphalānkṣipramārabhate kartuṃ na vighnayati tādṛśān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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