महाभारत 5.34.34
यदतप्तं प्रणमति न तत्संतापयन्त्यपियच्च स्वयं नतं दारु न तत्संनामयन्त्यपि
yadataptaṃ praṇamati na tatsaṃtāpayantyapiyacca svayaṃ nataṃ dāru na tatsaṃnāmayantyapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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