महाभारत 5.34.55
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जयेत्ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते
ātmānameva prathamaṃ deśarūpeṇa yo jayettato'mātyānamitrāṃśca na moghaṃ vijigīṣate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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