महाभारत 5.35.51
पापं कुर्वन्पापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम्पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यमेवाश्नुते फलम्
pāpaṃ kurvanpāpakīrtiḥ pāpamevāśnute phalampuṇyaṃ kurvanpuṇyakīrtiḥ puṇyamevāśnute phalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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