महाभारत 5.36.2
चरन्तं हंसरूपेण महर्षिं संशितव्रतम्साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा
carantaṃ haṃsarūpeṇa maharṣiṃ saṃśitavratamsādhyā devā mahāprājñaṃ paryapṛcchanta vai purā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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