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महाभारत 5.37.38
पश्य दोषान्पाण्डवैर्विग्रहे त्वं; यत्र व्यथेरन्नपि देवाः सशक्राःपुत्रैर्वैरं नित्यमुद्विग्नवासो; यशःप्रणाशो द्विषतां च हर्षः
paśya doṣānpāṇḍavairvigrahe tvaṃ; yatra vyatherannapi devāḥ saśakrāḥputrairvairaṃ nityamudvignavāso; yaśaḥpraṇāśo dviṣatāṃ ca harṣaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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