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महाभारत 5.37.53
स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्याये शत्रुसेविषुभोगे चायुषि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति
strīṣu rājasu sarpeṣu svādhyāye śatruseviṣubhoge cāyuṣi viśvāsaṃ kaḥ prājñaḥ kartumarhati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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