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महाभारत 5.37.5
वध्वा हासं श्वशुरो यश्च मन्यते; वध्वा वसन्नुत यो मानकामःपरक्षेत्रे निर्वपति यश्च बीजं; स्त्रियं च यः परिवदतेऽतिवेलम्
vadhvā hāsaṃ śvaśuro yaśca manyate; vadhvā vasannuta yo mānakāmaḥparakṣetre nirvapati yaśca bījaṃ; striyaṃ ca yaḥ parivadate'tivelam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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