महाभारत 5.38.32
अनार्यवृत्तमप्राज्ञमसूयकमधार्मिकम्अनर्थाः क्षिप्रमायान्ति वाग्दुष्टं क्रोधनं तथा
anāryavṛttamaprājñamasūyakamadhārmikamanarthāḥ kṣipramāyānti vāgduṣṭaṃ krodhanaṃ tathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें