महाभारत 5.38.42
यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणाःयं प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानवः
yaṃ praśaṃsanti kitavā yaṃ praśaṃsanti cāraṇāḥyaṃ praśaṃsanti bandhakyo na sa jīvati mānavaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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