महाभारत 5.39.25
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदतिदिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति
śrīmantaṃ jñātimāsādya yo jñātiravasīdatidigdhahastaṃ mṛga iva sa enastasya vindati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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