महाभारत 5.39.56
अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयःहविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम्
aṣṭau tānyavrataghnāni āpo mūlaṃ phalaṃ payaḥhavirbrāhmaṇakāmyā ca gurorvacanamauṣadham
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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