महाभारत 5.40.20
कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रियजलां नदीम्कृत्वा धृतिमयीं नावं जन्मदुर्गाणि संतर
kāmakrodhagrāhavatīṃ pañcendriyajalāṃ nadīmkṛtvā dhṛtimayīṃ nāvaṃ janmadurgāṇi saṃtara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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