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महाभारत 5.40.25
वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान्क्षत्रियांश्च; धनैः काले संविभज्याश्रितांश्चत्रेतापूतं धूममाघ्राय पुण्यं; प्रेत्य स्वर्गे देवसुखानि भुङ्क्ते
vaiśyo'dhītya brāhmaṇānkṣatriyāṃśca; dhanaiḥ kāle saṃvibhajyāśritāṃścatretāpūtaṃ dhūmamāghrāya puṇyaṃ; pretya svarge devasukhāni bhuṅkte
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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