महाभारत 5.42.25
अश्रान्तः स्यादनादानात्संमतो निरुपद्रवःशिष्टो न शिष्टवत्स स्याद्ब्राह्मणो ब्रह्मवित्कविः
aśrāntaḥ syādanādānātsaṃmato nirupadravaḥśiṣṭo na śiṣṭavatsa syādbrāhmaṇo brahmavitkaviḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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