महाभारत 5.42.27
सर्वान्स्विष्टकृतो देवान्विद्याद्य इह कश्चनन समानो ब्राह्मणस्य यस्मिन्प्रयतते स्वयम्
sarvānsviṣṭakṛto devānvidyādya iha kaścanana samāno brāhmaṇasya yasminprayatate svayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें